संगठनात्मक ढ़ाँचा शासन स्तर निदेशालय स्तर

 

 

 

पृष्ठभूमि      
 

          उत्तर प्रदेश में रेशम का इतिहास 1847 से प्रारम्भ होता है। सर्वप्रथम कैप्टन हालिंग नामक अंग्रेज सेना अधिकारी के द्वारा लखनऊ में रेशम कीटपालन का कार्य किया गया। कैप्टन हालिंग के बाद रेशम कीटों की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। वर्ष 1861 में एग्रो हार्टीकल्चर सोसाइटी ने डा० वोनाविया द्वारा लखनऊ बादशाह बाग में शहतूत का वृक्षारोपण कराया गया, जिस पर रेशम कीटपालन कार्य किया गया। वर्ष 1871 में देहरादून का नाम रेशम उद्योग में आया। ऐसा माना जाता है कि इसके पूर्व भी रेशम का कार्य यहाँ पर होता रहा था, परन्तु इतिहास में कहीं पर वर्णन नहीं आता है।

 

          1872-1975 के मध्य किये गये प्रयोगों से श्री एच०जी० रॉस, जो कि देहरादून निवासी थे, ने यह सिद्ध किया कि यह क्षेत्र रेशम कीटों के लिए उत्तम है। 1894 में शिक्षा विभाग एवं 1897 में वन विभाग ने रेशम कीटपान का कार्य किया, जिसमें सफलता मिली। 1911-1916 में शाहजहाँपुर के मुंशी अख्तर मो० खान द्वारा रेशम कीटों पर विभिन्न प्रयोग किये गये। 1933-46 के मध्य उ०यू०एस० साख्या, जो कि कानपुर कृषि विश्वविद्यालय में शिक्षक थे, ने शहतूती रेशम कीटों के साथ-साथ अण्डी कीटों पर भी अनुसंधान कार्य किया।

           1948 में देश की आजादी के पश्चात् यूनाईटेड प्रोविंस (उ०प्र०)  में यह कार्य वन विभाग द्वारा लगाये गये वृक्षारोपण के आधार पर कुटीर उद्योग निदेशालय के अन्तर्गत एक स्कीम के रूप में आरम्भ किया गया। पहला रेशम उत्पादन केन्द्र, डोईवाला (देहरादून) में वर्ष 1948 में खोला गया। पुनश्च रेशम उद्योग से सम्बन्धित कार्य वर्ष 1987 तक हथकरघा निदेशालय एवं हथकरघा निगम, कानपुर के अधीन था, परन्तु प्रदेश में रेशम उद्योग की सम्भावनाओं को ध्यान में रखते हुए वर्ष 1987 में प्रदेश सरकार द्वारा एक अलग "रेशम निदेशालय" की स्थापना का निर्णय लिया गया। वर्ष 1988 से रेशम निदेशालय द्वारा लखनऊ में विधिवत रूप से कार्य किया जा रहा है।

 

 

 

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