हमारे बारे में पृष्ठभूमि उद्देश्य
संगठनात्मक ढ़ाँचा शासन स्तर निदेशालय स्तर

 

 

 

टसर रेशम      
 

 

            टसर रेशम कीट एन्थिरिया माइलिटा प्रमुख रूप से आसन/अर्जुन की पत्तियां खाद्य के रूप में प्रयुक्त करता है। इसके अतिरिक्त कुछ प्राकृतिक टसर कीट प्रजातियां साल, सिद्ध, जामुन, बेर इत्यादि वृक्षों की पत्तियों को खाद्य के रूप में प्रयुक्त कर कोया निर्माण करते हैं। परन्तु मुख्य रूप से व्यवहारिक कीटपालन की द़ष्टि से आसन (Terminalia Tomentosa) व अर्जुन (T.Arjuna) वृक्ष टसर कीट का मुख्य आहार वृक्ष हैं। यह वृक्ष प्राकृतिक रूप से उष्ण कटिबन्धीय जंगलों में पाये जाते हैं। आसन एवं अर्जुन वृक्षों का वृक्षारोपण सघन रूप से भी विकसित किया जा सकता है, जो कि कीट पालन की द़ष्टि से आर्थिक रूप से लाभकारी हैं तथा प्रति इकाई क्षेत्रफल में सुगमता से देखभाल कर एक व्यक्ति अधिक आर्थिक लाभ अर्जित कर सकता है। टसर कीट प्राकृतिक रूप से जंगलों में पाया जाता रहा है। वैज्ञानिक प्रयास एवं अनुसंधान के द्वारा इस कीट को अर्द्ध-प्राकृतिक(Semi domesticated) अवस्था के अनुकूल बनाकर इसका व्यवसायिक उत्पादन प्रारम्भ किया गया है।

सघन अर्जुन वृक्षारोपण -

              सघन अर्जुन वृक्षारोपण जुलाई-अगस्त माह में 4 x 4 फीट की दूरी पर करने से प्रति हेक्टेयर लगभग 7000 पौधों की आवश्यकता होती है। यह वृक्षारोपण उचित रख-रखाव एवं देख-रेख की दशा में तीन वर्ष पश्चात कीटपालन योग्य हो जाता है। सघन वृक्षारोपण आर्थिक रूप से लाभप्रद होने से टसर रेशम उद्योग के विकास की एक प्रमुख उपलब्धि है। ऐसी भूमि जिस पर सिंचन क्षमता का अभाव हो तथा तथा कृषि हेतु अनुपयुक्त हो, का उपयोग सघन अर्जुन वृक्षारोपण में किया जा सकता है। इससे दोहरा लाभ होगा, एक तो वानिकी पर्यावरण का विकास होगा तथा दूसरा कीटपालन कर आर्थिक लाभ उठाया जा सकता है। एक हेक्टेयर सघन अर्जुन वृक्षारोपण से कम से कम औसतन 12000-14000 रूपये तक कीटपालन द्वारा आय अर्जित की जा सकती है। तुलनात्मक रूप से जंगल में कीटपालन करने से यह आर्थिक लाभ लगभग उपरोक्त का आधा रह जाता है। यदि लाभार्थी धागाकरण कार्य भी अपनाता है तो आय बढकर रूपये 18000/- वार्षिक तक पहुंच सकती है।

कीटपालन एवं कोया उत्पादन -

                 टसर कीटपालन कार्य जून/जुलाई माह में मानसून वर्षा प्रारम्भ होते ही शुरू हो जाता है। पहली फसल बीजू फसल कहलाती है जिसमें 35-40 दिन में कोया तैयार हो जाता है तथा द्वितीय फसल सितम्बर/अक्टूबर माह में प्रारम्भ हो जाती है। यह व्यावसायिक फसल कहलाती है तथा इसमें 55-60 दिन का समय लगता है। विभागीय स्थापित बीजागारों से उपरोक्त फसलों के कीटाण्ड प्राप्त कर प्रस्फुटित कीटों को खाद्य वृक्षों की मुलायम पत्तियों पर चढा दिया जाता है। कीट की देख-रेख एवं सुरक्षा नियमित रूप से करने पर पेडों पर ही कोया तैयार हो जाने के पश्चात जब कीट प्यूपा में परिवर्तित हो जाये अर्थात कोया निर्माण के एक सप्ताह पश्चात कोयों को खाद्य वृक्षों की पतली टहनियों सहित वृक्ष से काटकर अलग कर लेना चाहिए। इनमें से कोया को अलग कर ग्रेड के अनुसार छांटकर कोया बाजार में नीलामी कर नगद भुगतान एवं तुरन्त भुगतान के आधार पर विक्रय कर दिया जाता है।

कीटपालन एवं आवश्यक सुझाव -

  1. खाद्य वृक्षों का चुनाव, सफाई एवं छंटाई कीटपालन से लगभग 10 दिन पूर्व कर लेनी चाहिए।

  2. जल जमाव वाले स्थलों का चुनाव कीटपालन हेतु न किया जाये।

  3. बीजागार से प्रस्फुटन से पूर्व कीटाण्ड प्राप्त कर नमी वाले साफ व स्वच्छ स्थान पर घरों में रखना चाहिए। जिससे अण्डे के अन्दर विकसित होने वाले भ्रूण का उचित विकास होता रहे। प्राय: कीटपालन के दौरान उचित आद्रता एवं तापक्रम युक्त वातावरण रहता है। यदि इसमें कमी या अधिकता महसूस हो तो प्रयास कर अपेक्षित स्थान पर रखा जाये।

  4. कीटाण्ड प्रस्फुटन के पश्चात कीटपालन, घर/झोपडी के अन्दर (इनडोर) घड़े अथवा बोतल में खाद्य वृक्षों की टहनियां लगाकर 72 घण्टे तक किये जाने से प्ररम्भिक क्षति को रोका जा सकता है। इससे औसत उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है।

  5. शिशु कीटों का आहार वृक्ष पर मौसम की अनुकूलता को देखते हुए स्थानान्तरित किया जाये अन्यथा तेज वर्षा, कड़ी धूप, तेज हवा/आंधी द्वारा कीट फसल को व्यापक क्षति हो सकती है।

  6. कीट की प्रथम अवस्था से तृतीय अवस्था तक विभिन्न कीड़े-मकोड़ों जैसे चिपरी (कैन्थीकोना), बर्रे (वास्प) चीटियों आदि के द्वारा अधिक हानि होती है, जिसे रोकने के लिए उपयुक्त उँचाई के वृक्षों का चुनाव तथा कीटपालन से पूर्व ऐसे कीटों के स्थानों को नष्ट करना आवश्यक होता है।

  7. स्वस्थ कीट के विकास हेतु आवश्यक है कि शिशु कीटपालन स्थल के वृक्षों पर कीटपालन से पूर्व 2 प्रतिशत फार्मलीन घोल का छिड़काव किया जाये तथा वृक्षों के तनों के चारो ओर गर्म राख तथा बी०एच०सी० चारों ओर डाली जाये।

  8. यथासम्‍भव प्रथम एवं द्वितीय अवस्था में शिशु कीटों का स्थानान्तरण एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष के ऊपर न किया जाय। स्थानान्तरण करने के लिए प्रूनिंग सीजर्स अथवा हंसुए से पतली टहनियों को पत्ती सहित काटकर स्थानान्तरित किया जाये। कीटों को हाथ से कम से कम छुआ जाये।

  9. कीटपालन में स्वस्थ वातावरण एवं सफाई का विशेष महत्व है। कीटपालन स्थल साफ एवं स्वच्छ रखा जाये व कीट स्थानान्तरण से पूर्व एवं पश्चात 2 प्रतिशत फार्मलीन घोल से हाथ अवश्य धोया जाय तथा इस घोल से भरे मिट्टी के पात्र को प्रत्येक कीटपालन स्थल के पास रहना आवश्यक है।

  10. टसर कीट अपनी पांच अवस्थाओं तथा चार मोल्ट के द्वारा अपना कृमिकाल (लारवल पीरिएड) पूर्ण करता है। इस दौरान निर्मोचन (मोल्ट) के कीट स्थानान्तरण वर्जित है।

  11. मृत/रोगग्रस्त कीट को पेड़ से उतार कर कीटपालन स्थल से बाहर लगभग एक फुट गहरे गड्डे में दबाया जाना नितान्त आवश्यक है। इससे अन्य कीटों में बीमारी फैलने से रोका जा सकता है।

  12. कीट पालन क्षेत्र में चूना तथा ब्लीचिंग पाउडर का उपयोग समय-समय पर किया जाना लाभप्रद होता है।

  13. तृतीय से पंचम अवस्था के दौरान पक्षियों, नेवलों, सर्प आदि से सुरक्षा हेतु कीटपालक को कड़ी चौकसी रखनी आवश्यक होती है।

  14. खाद्य वृक्ष पर 10 प्रतिशत पत्ती अवशेष रहते ही दूसरे खाद्य वृक्ष पर स्थानान्तरण कर देना चाहिए जिससे कीटों के भूखे रहने की सम्‍भावना न रहे।

  15. कोया निर्माण के लिए कीट दो-तीन पत्तियां इकट्ठा कर हैमक (आधार) को निर्माण करता है। अत: यह आवश्यक है कि अन्तिम अवस्था में कीटों को पर्याप्त पत्ती वाले पेड़ों पर रखा जाये।

  16. टसर कीट लगभग 80 प्रतिशत पत्ती का उपयोग पांचवी एवं अन्तिम अवस्था में करता है। अत: यह आवश्यक है कि एक वृक्ष पर कम कीड़े रखे जायें जिससे उनका बार-बार स्थानान्तरण न करना पड़े एवं इससे होने वाली क्षति को रोका जा सके।

  17. कोया निर्माण प्रारम्भ होते ही एक सप्ताह बाद उसे खाद्य वृक्षों की पतली टहनियों सहित काटकर अलग करना चाहिए। कच्चे एवं अविकसित कोयों को तोड़ने से कीटपालक को ही क्षति होती है। अत: प्यूपा निर्माण होने के पश्चात कोयों को खाद्य की टहनी से अलग किया जाये।

  18. कटे हुए कोयों को डाली से अलग कर ग्रेड के अनुसार छांट कर रीलिंग/बीजू, कट एवं फिल्मजी श्रेणी में अलग-अलग रखना चाहिए।

 

रेशम उद्योग में समिति/स्वैच्छिक संगठनों का योगदान -

     कोई भी उद्योग बिना व्यक्तिगत क्षेत्र में कार्यक्रम को फैलाये विकसित नही हो सकता है तथा इसे जन आन्दोलन का रूप देने के लिए रेशम उद्योग में समितियों एवं स्वैच्छिक संगठनों की महत्वपूर्ण भमिका है। रेशम निदेशालय द्वारा कीटपालकों व धागाकरण करने वाली समितियों का गठन किया गया है। जिनको पंजीकृत कर प्रबन्धकीय सहायता आदि की सुविधा है तथा ये समितियां रेशम उद्योग के विभिन्न कार्यो को स्वतंत्र रूप से सम्पादित कर सकती हैं। इसी प्रकार स्वैच्छिक संगठन रेशम उद्योग के प्रचार-प्रसार, प्रशिक्षण, वृक्षारोपण, कीटपालन, धागाकरण एवं बुनाई कार्यो को अपनाकर रेशम उद्योग के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भमिका निभा सकते हैं। इस दिशा में विभिन्न स्वैच्छिक संगठनों का सहयोग प्राप्त किया जा रहा है।

 

विभागीय प्रदत्त सुविधायें -

  1. अर्जुन पौध की आपूर्ति व्यवस्था करना।

  2. नि:शुल्क प्रशिक्षण एवं तकनीकी जानकारी।

  3. टसर कीट बीज का न्यूनतम मूल्य पर वितरण।

  4. कोया-विक्रय की तुरन्त भुगतान एवं विक्रय व्यवस्था।

  5. धागाकरण हेतु कैटालिटिक विकास योजना में वित्तीय सहायता।

  6. सघन अर्जुन वृक्षारोपण पर कीटपालकों को कीटपालन उपयोग की अनुमति।

 

 

 

 

कापीराइट ©2011, रेशम निदेशालय, उत्‍तर प्रदेश सरकार, भारत | 1024x768 पर सर्वोत्तम दृष्‍टि